Thursday, November 10, 2005

बालगीत

चिड़िया और बच्चे

चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ
भूख लगी मैं क्या खाऊँ
बरस रहा बाहर पानी
बादल करता मनमानी
निकलूँगी तो भीगूँगी
नाक बजेगी सूँ सूँ सूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ .......
माँ बादल कैसा होता ?
क्या काजल जैसा होता
पानी कैसे ले जाता है ?
फिर इसको बरसाता क्यूँ ?
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ .......
मुझको उड़ना सिखला दो
बाहर क्या है दिखला दो
तुम घर में बैठा करना
उड़ूँ रात-दिन फर्रकफूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ .......
बाहर धरती बहुत बड़ी
घूम रही है चाक चढ़ी
पंख निकलने दे पहले
फिर उड़ लेना जी भर तूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ .......
उड़ना तुझे सिखाऊँगी
बाहर खूब घुमाऊँगी
रात हो गई लोरी गा दूँ
सो जा, बोल रही म्याऊँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ
भूख लगी मैं क्या खाऊँ ?
-डॉ० जगदीश व्योम
--००--


कोयल और कौआ

कौआ बोला मेरे संग में
पलकर हुई सयानी तुम
पर पाती सम्मान अकेली
जग में कोयल रानी तुम।।
मैं काला हूँ तुम भी काली
जग की रीति निराली है
तुमको मिलता प्यार बहुत-सा
मुझको नफ़रत-गाली है।।
इतना सुनकर तनिक पास आ
कोयल उससे यों बोली
मिलता है सम्मान उसी को
जिसकी मीठी है बोली।।
तन का गोरा नहीं जरूरी
मन होता है जिसका साफ
करने लग जाती है दुनिया
प्यार उसी से अपने आप।।
तुम भी अपना कपट त्याग दो
मीठी कर लो निज वाणी
करने लग जाएगा तुमसे
प्यार धरा का हर प्राणी।।
-सन्तोष कुमार सिंह
-०००-


दो माली

एक बाग के थे दो माली
कभी नहीं रहते थे खाली
लीची आम अनार लगाते
पर बेचारे कभी न खाते
तरह-तरह के पेड़ लगाये
फल उनके औरों ने खाये
दोनों ताली बजा रहे थे
मिलकर पंछी उड़ा रहे थे।।
-इंदिरा गौड़
-००-


सूरज

मैं हूँ सूरज भोर का
दुश्मन हूँ तम घोर का।
रोज सबेरे आता हूँ
अपना फर्ज निभाता हूँ
किरणों के तीखे भाले से
तम को मार भगाता हूँ
कलियाँ खिलतीं फूल बिहँसते
चिड़ी चहकती शोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
ठीक समय पर पहुँचा करता
नहीं बहाना करता हूँ
सर्दी-गर्मी या वर्षा हो
नहीं किसी से डरता हूँ
बर्फ गिरे, आँधी आये या
आये तूफां जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
बच्चो ! कभी नहीं कम होने
देना अपने साहस को
और कभी मत पास फटकने
देना अपने आलस को
फिर मेरी ही तरह तुम्हारा
स्वागत होगा जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
-डॉ० दिनेश पाठक 'शशि`
-००-


नन्हीं कलम

सरकंडे को छील बनाई
मैंने नन्हीं एक कलम
जल पर भी सर सर चलती थी
ऐसी थी वह नेक कलम
कुछ दिन पर एक चिड़िया आई
बोली मुझे कलम दे दो
चिड़िया के संग, चिड़िया बन मैं
लगा खेलने, फेंक कलम।
-दामोदर अग्रवाल
-००-


उलटा अखबार

थामे बैठे हैं चिंटू जी
जब से आया है अखबार
उलट-पुलट कर देख रहे हैं
घण्टे बीत गए हैं चार
मम्मी बोली, चिंटू प्यारे
लगन तुम्हारी अपरम्पार
लेकिन कहना मानो बेटे
सीधा तो कर लो अखबार।
-प्रकाश मनु
-००-

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