Friday, November 25, 2005

पुस्तकें

मेरा जैकी














मेहनत का फल















अनुपम बाल कहानियाँ
















कदम कदम समझौते





























जादू की अँगूँठी










बेड़ियाँ











अनुत्तरित










अमर ज्योति








आधी हकीकत







भारतीय रेल : इतिहास एवं उपलब्धियाँ

डॉ॰ दिनेश पाठक 'शशि'

प्रकाशक- जाह्नवी प्रकाशन, दिल्ली- 95

संस्करण- 2004

मूल्य- 150 रुपये


***



टुकड़ा-टुकड़ा सच (व्यंग्य-संग्रह)

संपादक- दिनेश पाठक 'शशि'

प्रकाशक- विभोर प्रकाशन, दिल्ली- 92

संस्करण- 2003

मूल्य- 150 रुपये



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सपने में सपना (बाल कहानी-संग्रह)

दिनेश पाठक 'शशि'

प्रकाशक- जाह्नवी प्रकाशन, दिल्ली- 32

संस्करण- 2001

मूल्य- 50 रुपये



***



धुन्ध के पार (कहानी-संग्रह)

दिनेश पाठक 'शशि'

प्रकाशक- सुन्दर साहित्य सदन, दिल्ली- 6

संस्करण- 2004

मूल्य- 100 रुपये


***




हाँ यह सच है (लघुकथा-संग्रह)

दिनेश पाठक 'शशि'

प्रकाशक- श्री शिव-शक्ति प्रकाशन, कोसीकलाँ, मथुरा

संस्करण- मई- 2000

मूल्य- 80 रुपये


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शब्दों के तेवर (लघुकथा संकलन)
( 80 लघुकथाएँ )

संपादक- दिनेश पाठक 'शशि'

प्रकाशक- सुन्दर साहित्य सदन, दिल्ली- 6

संस्करण- 2000

मूल्य- 100 रुपये

Thursday, November 10, 2005

सूरज

मैं हूँ सूरज भोर का
दुश्मन हूँ तम घोर का।
रोज सबेरे आता हूँ
अपना फर्ज निभाता हूँ
किरणों के तीखे भाले से
तम को मार भगाता हूँ
कलियाँ खिलतीं फूल बिहँसते
चिड़ी चहकती शोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
ठीक समय पर पहुँचा करता
नहीं बहाना करता हूँ
सर्दी-गर्मी या वर्षा हो
नहीं किसी से डरता हूँ
बर्फ गिरे, आँधी आये या
आये तूफां जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
बच्चो ! कभी नहीं कम होने
देना अपने साहस को
और कभी मत पास फटकने
देना अपने आलस को
फिर मेरी ही तरह तुम्हारा
स्वागत होगा जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
***
-डॉ० दिनेश पाठक 'शशि`

बालगीत

चिड़िया और बच्चे

चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ
भूख लगी मैं क्या खाऊँ
बरस रहा बाहर पानी
बादल करता मनमानी
निकलूँगी तो भीगूँगी
नाक बजेगी सूँ सूँ सूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ .......
माँ बादल कैसा होता ?
क्या काजल जैसा होता
पानी कैसे ले जाता है ?
फिर इसको बरसाता क्यूँ ?
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ .......
मुझको उड़ना सिखला दो
बाहर क्या है दिखला दो
तुम घर में बैठा करना
उड़ूँ रात-दिन फर्रकफूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ .......
बाहर धरती बहुत बड़ी
घूम रही है चाक चढ़ी
पंख निकलने दे पहले
फिर उड़ लेना जी भर तूँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ .......
उड़ना तुझे सिखाऊँगी
बाहर खूब घुमाऊँगी
रात हो गई लोरी गा दूँ
सो जा, बोल रही म्याऊँ
चीं चीं चीं चीं चूँ चूँ चूँ चूँ
भूख लगी मैं क्या खाऊँ ?
-डॉ० जगदीश व्योम
--००--


कोयल और कौआ

कौआ बोला मेरे संग में
पलकर हुई सयानी तुम
पर पाती सम्मान अकेली
जग में कोयल रानी तुम।।
मैं काला हूँ तुम भी काली
जग की रीति निराली है
तुमको मिलता प्यार बहुत-सा
मुझको नफ़रत-गाली है।।
इतना सुनकर तनिक पास आ
कोयल उससे यों बोली
मिलता है सम्मान उसी को
जिसकी मीठी है बोली।।
तन का गोरा नहीं जरूरी
मन होता है जिसका साफ
करने लग जाती है दुनिया
प्यार उसी से अपने आप।।
तुम भी अपना कपट त्याग दो
मीठी कर लो निज वाणी
करने लग जाएगा तुमसे
प्यार धरा का हर प्राणी।।
-सन्तोष कुमार सिंह
-०००-


दो माली

एक बाग के थे दो माली
कभी नहीं रहते थे खाली
लीची आम अनार लगाते
पर बेचारे कभी न खाते
तरह-तरह के पेड़ लगाये
फल उनके औरों ने खाये
दोनों ताली बजा रहे थे
मिलकर पंछी उड़ा रहे थे।।
-इंदिरा गौड़
-००-


सूरज

मैं हूँ सूरज भोर का
दुश्मन हूँ तम घोर का।
रोज सबेरे आता हूँ
अपना फर्ज निभाता हूँ
किरणों के तीखे भाले से
तम को मार भगाता हूँ
कलियाँ खिलतीं फूल बिहँसते
चिड़ी चहकती शोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
ठीक समय पर पहुँचा करता
नहीं बहाना करता हूँ
सर्दी-गर्मी या वर्षा हो
नहीं किसी से डरता हूँ
बर्फ गिरे, आँधी आये या
आये तूफां जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
बच्चो ! कभी नहीं कम होने
देना अपने साहस को
और कभी मत पास फटकने
देना अपने आलस को
फिर मेरी ही तरह तुम्हारा
स्वागत होगा जोर का।
मैं हूँ सूरज भोर का।।
-डॉ० दिनेश पाठक 'शशि`
-००-


नन्हीं कलम

सरकंडे को छील बनाई
मैंने नन्हीं एक कलम
जल पर भी सर सर चलती थी
ऐसी थी वह नेक कलम
कुछ दिन पर एक चिड़िया आई
बोली मुझे कलम दे दो
चिड़िया के संग, चिड़िया बन मैं
लगा खेलने, फेंक कलम।
-दामोदर अग्रवाल
-००-


उलटा अखबार

थामे बैठे हैं चिंटू जी
जब से आया है अखबार
उलट-पुलट कर देख रहे हैं
घण्टे बीत गए हैं चार
मम्मी बोली, चिंटू प्यारे
लगन तुम्हारी अपरम्पार
लेकिन कहना मानो बेटे
सीधा तो कर लो अखबार।
-प्रकाश मनु
-००-

Wednesday, November 09, 2005

अलार्म

( कहानी )

-श्रीमती शशि पाठक

अलार्म की आवाज सुन मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी। 'ये असमय अलार्म कैसे बजा......अभी तो रात के दो ही बजे हैं। मेरी आँख तो प्रात: समय से ही खुल जाती है। मेजर पति की संगति में कुछ सीखा हो या न सीखा हो, अनुशासन अवश्य सीखा है। पति को समय की पाबन्दी का बहुत ही ध्यान रहता था। एक बार को घड़ी रुक सकती है किन्तु वो कभी भी किसी भी कार्य में सुस्ती बरदास्त नहीं करते थे। एक बार की अभी तक याद है- सुबह नाश्ते में थोड़ी सी देर हो गई तो खाना छोड़ यूनिट पहुँच गये थे। उस दिन मैंने हर काम समय से करने की कसम खा ली।
नींद आँखों से उचट चुकी थी। बेटा भी घर पर नहीं है जो उसने अलार्म भरा हो। नींद में व्यवधान पड़ने से सिर भारी हो गया। उठ कर एक गिलास पानी पिया और फिर से आकर लेट गई। एक तो पहले ही नई जगह होने के कारण नींद देर से आई थी।
दीवार पर टँगे पति के फोटो पर नजर जाते ही आँखें भर आईं। कितना गर्वीला और तेजयुक्त मुस्कराता चेहरा है। ऐसा लग रहा है जैसे अभी बोल उठेंगे। दूसरी तरफ भारत का फोटो लगा हुआ है। कालेज में डिग्री लेते हुए।.......दुबारा नजर पति के चेहरे पर टिक गई। चेहरा निहारते-निहारते मैं यादों के समुद्र में गोते लगाने लगी।
उस दिन पिता जी बहुत खुश थे। उनके चेहरे की प्रसन्नता देखते ही बनती थी। हम सब भाई-बहन उनका खिला-खिला चेहरा देख ही रहे थे तब तक माँ ने पूछ ही लिया-
"क्यों कर्नल साहब! आज क्या बात है जो इतने प्रसन्न दिख रहे हो?"
"हाँ, आज बात ही कुछ ऐसी है.......सुनोगी तो तुम भी खुशी से झूम उठोगी।"
"अच्छा! ज़रा मैं भी तो जानूँ , ऐसी क्या बात है?"
"अपनी कुसुम के लिये जैसे घर की तलाश थी, वैसा मिल गया।"
"अच्छा! क्या करता है.......कहाँ रहता है?"
"बस, यही मत पूछो। लड़का आर्मी में है और यहीं, इसी शहर में रहता है.......कहीं कुछ......न.....न.....ये रिश्ता मंजूर नहीं।" माँ ने फोटो देखते हुए कहा।
"कर दी न फिर पागलों जैसी बात.....अरे! मैं भी तो आर्मी में हूँ। मुझे कुछ हुआ.....? जो होना होता है वह अवश्य होता है, चाहे किसी भी जगह क्यों न हो।" अपनी दलीलों से पिता जी ने माँ को इस शादी के लिए तैयार कर लिया।
सभी रस्मो-रिवाज को निभाते हुए मैं ससुराल आ गई। अच्छी ससुराल पाकर मैं अपने को धन्य मान रही थी और सकुचाइ-सकुचाई सी बैठी थी, तभी चुपके से इन्होंने कमरे में प्रवेश किया और मेरा चेहरा ऊपर करते हुए बोले-
"तुम सचमुच ज़न्नत की परी लग रही हो। मेरा दूसरा प्यार पाने का हक है तुम्हें।"
"दूसरा प्यार!" मैं सशंकित हो उठी "दूसरा प्यार ........मतलब?"
"घबरा गई न? अरे! वह तुम्हारी सौत नहीं, माता है, भारत माता, जो हर सच्चे देश-भक्त का पहला प्यार है।"-इतना कह मुझे उन्होंने अपने अंक में समा लिया।
सभी कुछ हँसी-खुशी बीत रहा था। पूरे घर के सदस्यों में अनुशासन और देश-भक्ति कूट-कूटकर भर दी थी। मुझे वैसा ही माहौल मिल गया जैसा अपने मायके में छोड़ कर आयी थी। एक दिन मुझे पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ, तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मैं बेसब्री से ये सूचना देने के लिये इनका इंतजार कर रही थी कि तभी टेलीफोन की घण्टी घनघना उठी। रिसीवर उठाते ही वहाँ से आवाज आई-
"देशभक्त बोल रहा हूँ। दुश्मनों ने सीमा पर गोलीबारी शुरू कर दी है इसलिये मुझे मोर्चे पर तुरन्त जाना है। कब लौटूँगा......पता नहीं। चिन्ता मत करना।"
"हलो!......हलो!..... मैं चिल्लाती ही रह गई। उन्होंने रिसीवर रख दिया। पूरे घर में अजीब सन्नाटा सा पसर गया। दुश्मनों की गोलीबारी और हमारी फौज के जवाबी फायर थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। सभी लोग डरे-सहमे से रेडियो, टेलीविजन से चिपके रहते। दहशत के साये में दिन बीत रहे थे। मन को कुछ भी अच्छा नहीं लगता था।"
एक दिन शाम से ही मेरी तबियत खराब होने लगी। मुझे तुरन्त नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया। सुबह होते-होते बेटे 'भारत` का जन्म हो गया।
इधर भारत ने जन्म लिया, उधर युद्ध विराम की घोषणा हो गई। सभी ने राहत की साँस ली। लगभग सारे सैनिक वापस कर दिये गए थे, पर अभी तक भारत के पापा नहीं लौटे थे।
एक दिन भारत की मालिश कर स्नान कराते-कराते मैं कहती जा रही थी- "राजा बेटा! नहा-धोकर और राजा बन जायेगा। पापा आयेंगे, राजा बेटा को देखकर प्रसन्न हो जायेंगे।"
तभी दरवाजे की कॉलबेल बज उठी। भारत को जल्दी-जल्दी वॉकर में लिटाकर उत्साह से दरवाजा खोला।
सामने डकिया खड़ा था- "बीबी जी तार।"
उसके हाथ से तार लेकर जल्दी से खोलकर पढ़ने लगी तो सिर चकराने लगा।
"मेजर देशभक्त शहीद हो गए।" पढ़ते-पढ़ते ही आँखों के आगे अँधेरा छा गया और मैं बेहोश होकर गिर पड़ी।
देखते ही देखते सारे सुख तिरोहित हो गये, पर मैंने मन ही मन तय कर लिया कि उनके बेटे को एक अच्छा देशभक्त बनाऊँगी तभी से भारत की उच्च शिक्षा एवं संस्कारों के प्रति सजग हो उठी मैं। भारत ने भी मेरी भावनाओं को समझ लिया हो जैसे। वह शिक्षा के पायदानों पर चढ़ते हुए आज 'कैप्टन भारत` होकर देश-सेवा कर रहा है।
चिड़ियों की चहचहाअट और दरवाजे पर दूधवाले की आवाज के साथ ही मेरी तन्द्रा टूट गई। रात भर सो न पाने से आँखें लाल हो उठी थीं।। दूध लेने के बाद फिर से दैनिक कार्यों में लग गई। जीप का हॉर्न सुन दरवाजा खोला तो देखा भारत वापस आ गया है। आते ही वह मेरे कन्धे पर झूल गया, बोला- "कहो माँ! सब ठीक तो रहा? तुम्हारी आँखें कैसे लाल हो रही हैं?"
"कुछ नहीं बेटा, रात को दो बजे आँख खुल गयी थी फिर नींद नहीं आई।"
"दो बजे क्यों माँ?"
"अरे! तूने घड़ी में दो बजे का अलार्म जो भरा था। उसी की आवाज से नींद टूट गयी।"
"क्या!......दो बजे अलार्म बजा था?" -उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।
"हाँ भाई!.....अब ले, चाय पी ले।"
उसने अनमने मन से चाय पी और तुरन्त ही घड़ी के पास पहुँच गया। बटन दबाते ही उधर से आवाज आयी-
"जूलियट स्पीकिंग....।"
"कैप्टन भारत हियर......रात के दो बजे कॉल किसलिये किया था?"
"हमें पता नहीं......बॉस ने शायद याद किया था। आज फिर तीन बजे बात करेंगे।"
"ठीक है।" -कहते हुए भारत ने स्विच ऑफ कर दिया और 'माँ` पुकारते हुये जैसे ही वह पलटा, मुझे दरवाजे पर खड़ा देख वह सकपका गया।
"क्या बात है बेटा?...........क्या दुश्मनों ने हमला कर दिया है?" मैंने डरते हुये पूछा।
"अरे नहीं माँ!......वैसे ही कुछ और काम था।" -उसने अचकचाते हुए कहा।
मुझे लगा कुछ गड़बड़ी जरूर है, फिर भी अपने को सामान्य बनाते हुए बोली- "चल! पानी गरम हो गया है, नहा ले.....तब तक मैं नाश्ता लगा देती हूँ।"
खाना खाने के बाद भरत सो गया लेकिन मेरा मन दिन भर इसी उधेड़बुन में लगा रहा। आखिर घड़ी के अलार्म से सारी वार्ताओं का क्या सम्बन्ध है?.........शायद कोई गुप्त सूचना रही होगी जो टेलीफोन से नहीं दी जा सकती होगी। आजकल टेलीफोन सिस्टम भी तो विश्वसनीय नहीं रहे। अगले ही पल सोचने लगती कि अक्सर भारत के पिता बताया करते थे कि आर्मी के कुछ अधिकारी देश के साथ गद्दारी करके बहुत से महत्वपूर्ण राज़ विदेशी जासूसों को दे रहे हैं।......नहीं.......ये मैं क्या ऊल-जलूल सोचने लगी। अपना भारत ऐसा नहीं कर सकता। सिर को झटका देते हुये इस बात को दिमाग से बाहर करने लगी लेकिन अगले ही पल मन फिर सोचने लगता कि कहीं ऐसा ही हुआ तो........फिर मेरे सारे अरमानों का क्या होगा?.......क्या भारत के पिता का बलिदान व्यर्थ जायेगा। ......नहीं......मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूँगी। देश हित मेरे सामने पहले है लेकिन फिर सोचती 'भारत भला ऐसा क्यों करेगा?
इसी ऊहापोह में सभी कार्य निबटाने के बाद सोने चली गई। नींद आँखों से कोसों दूर लग रही थी, फिर भी मैं आँखें बन्द किये सोने का अभिनय कर रही थी। दिल जोर से धड़क रहा था। कहीं मेरी शंका सही निकली तो........हे भगवान, ये मेरे किन कर्मों की सजा दे रहा है। जवानी में पति खो दिया, अब बुढ़ापे में एक ही तो सहारा हैै। लेकिन मुझे ऐसा सहारा हरगिज नहीं चाहिये जो देशद्रोही हो।.........वो मेरा सहारा नहीं, शत्रु है।............मैं खत्म कर दूँगी उसे।
सोचते-सोचते नींद ने आ घेरा। टेलीफोन की घंटी बजते ही भारत ने रिसीवर उठा लिया- "हलो! कैप्टन भारत स्पीकिंग।"
"अपने समस्त अड्डों का नक्शा और अस्त्र-शस्त्रों का विवरण शीघ्र दीजिये।"
"कहाँ......और कब...?"
"अब से एक घण्टे बाद सीमा पार हमारा आदमी मिलेगा जो आपको सही जगह पहुँचा देगा।"
"पहचान क्या रहेगी...?"
"कोट में काला गुलाब।"
"ठीक है......." -कहते हुए भारत अलमारी में से फाइलें निकालने लगा। कुछ देर बाद चलने के लिये जैसे ही वह अपनी कुर्सी से उठा, मैंने फुर्ती के साथ रिवाल्वर से गोली दाग दी। गोली लगने के साथ ही वह जमीन पर गिर पड़ा। मैं संज्ञा शून्य उसके निस्तेज शरीर को देखे जा रही थी। अचानक मेरा ममत्व जाग उठा। 'मैंने ये क्या कर दिया....?.....अपने ही हाथों मैंने अपनी ही ममता का गला घोंट दिया। मैं भारत के बिना नहीं जी सकती.......नहीं मैं भी जीवित नहीं रहूँगी......नहीं.......।`
घबराकर मेरी आँख खुल गई।......ये कैसा भयानक सपना देख रही थी मैं। इससे तो मेरी दुनिया ही उजड़ गई थी। नंगे पैर ही मैं भारत के कमरे की ओर दौड़ी। वह मेज पर झुका कुछ लिखने में व्यस्त था। उसके चारों ओर फाइलें बिखरी पड़ी थीं। ये देख मुझे राहत मिली। घड़ी की ओर देखा, तीन बजने में अभी देर थी। फ्रिज से बोतल निकाल कर पानी पिया। भारत से भी पानी के लिये पूछा।
"हाँ माँ ला दो....।"
पानी का गिलास जैसे ही मैंने मेज पर रखा कि अलार्म बज उठा। तुरन्त ही घड़ी का स्विच ऑन करके भारत बोला-
"हलो.....कैप्टन भारत हियर!"
मैंने झट से बंद दरवाजे से कान सटा दिये। दूसरे कमरे में बात कर रहे भारत की बातें सुनाई पड़ रही थीं।
"अब से एक घंटे बाद सब सामान के साथ पहुँचो।" -दूसरी ओर से आदेश मिला।
"ठीक है....... पर मेरे हिस्से का ध्यान रखना।" -कहकर भारत ने स्विच ऑफ कर दिया, फिर जल्दी-जल्दी सभी फाइलें समेट कर चलने के लिए तैयार होने लगा तो मैं झटपट एक ओर को हो गई। मेरे दिल को धक्का सा लगा.....'ये क्या!`.....ये सब तो सपने की तरह ही घटित हो रहा है। तो क्या मुझे सपने की तरह ही करना पड़ेगा।.......नहीं.......ऐसा मैं नहीं कर सकूँगी।....लेकिन भारत अपने देश के साथ जो गद्दारी करने जा रहा है उसे भी हरगिज वैसा नहीं करने दूँगी......और मैं पलक झपकते ही भारत के सामने जा पहुँची।
"ये सब क्या कर रहे हो भारत?"
"कुछ नहीं माँ......कुछ भी तो नहीं...!"
"देखो भारत! तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो.......बेटे! देश के साथ गद्दारी करने वालों का नाम कभी अमर नहीं हुआ।"
"नहीं माँ!.....तुम्हें भ्रम हुआ है।"
"भ्रम...? और मुझे..?......फिर ये सब क्या है?.......घड़ी के अलार्म के साथ गुप्त सूचनाएँ और ........गद्दारी करने ही जा रहे हो न?"
"हाँ...हाँ...मैं गद्दारी करने जा रहा हूँ....बस!"
"अरे करम जले! क्या इसी दिन के लिये पैदा किया था कि तू मेरे और अपने पिता के सपनों को मिट्टी में मिलाकर देश को फिर से गुलाम बना दे।.........लेकिन मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूँगी।"
अपनी साड़ी में छिपी रिवाल्वर मैंने भारत पर तान दी। "........खबरदार!......देशभक्त की पत्नी हूँ.......अगर तूने कमरे से बाहर जाने की जरा भी कोशिश की तो ये सारी की सारी गोलियाँ तेरे सीने में उतार दूँगी।"
भरत ने एक ही झपट्टा में रिवाल्वर मेरे हाथ से छीन ली। मेरा सिर दीवार से जा टकराया। आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा और फिर मैं बेहोश हो गई।
सूर्य की पहली किरण के साथ चिड़ियों का चहचहाना कानों में पड़ा तो मैंने मिचमिचाते हुए आँखें खोलीं। सिर टकराने के कारण चोट में दर्द महसूस हुआ और रात को घटी सारी घटना आँखों के सामने ताजा हो उठी। शरीर एकदम से शिथिल पड़ चुका था। भारत को देश के साथ गद्दारी करने से रोक न पाई। इस ग्लानि से मन डूब रहा था। मेरा सारा जीवन व्यर्थ गया।
कॉलबेल की घंटी लगातार बजती जा रही थी। पड़ोस का बंटी जोर-जोर से कह रहा था-
"आंटी! दरवाजा खोलो!.....देखो आज के अखबार में भारत भैया का फोटो छपा है।"
दरवाजे का सहारा लेकर उठते हुए मैंने दरवाजा खोल दिया और बंटी के हाथ से अखबार लेकर पढ़ने लगी।
"बुद्धिमान युवा कैप्टन भारत ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए दस्तावेज थमाने के बहाने दुश्मनों के सभी ठिकानों का पता लगाकर उन्हें करारी शिकस्त दी। कैप्टन भारत इस महान कार्य के लिये सम्मानित किये जायेंगे।" पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों में खुशी के आँसू छलछला आये और सीना गर्व से स्वत: ही फूल गया।
कुछ ही देर में दरवाजे पर आकर एक जीप रुकी। जीप से उतर कर भारत मेरे पैरों पर गिर पड़ा और फफक-फफक कर रोने लगा-
"माँ! मुझे रात को किये गए व्यवहार के लिए मॉफ कर दो। उस समय आपको सही बात न बता पाने की मेरी मजबूरी थी क्योंकि दुश्मनों के जासूस हमारी सभी बातों पर निगरानी रखे हुए थे। रात भावुकता वश जरा सा भी भेद खुल जाता तो मैं अपने मिशन में कामयाब नहीं होता।.......मुझे मॉफ कर दो माँ।"
"नहीं बेटे! तूने तो आज मेरा और अपने देश का मस्तक बहुत ऊँचा कर दिया है। मुझे तुझसे यही उम्मीद थी।"
***
-श्रीमती शशि पाठक